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कोई दानव

जनवादी ग़ज़लकार

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कोई दानव - सा आकर मेरा घर लूट गया
        
                                                    
                            
महँगाई की गाज गिरी, हर सपना टूट गया

कितना घाघ है दफ़्तर का वो बाबू , मत पूछो
सरकारी अनुदान का मेरा हिस्सा लूट गया

बच्चों को भी रोटी अब गिन गिन कर मिलती है
ज़ोर नहीं चलता, जैसे ईश्वर ही रूठ गया

कैसे दाल पकाएँ , बीवी सुबह से पूछ रही
मिट्टी का इक ही बरतन था वह भी फूट गया

मेरे दिल पर क्या बीते ये किसने सोचा है
सबसे अधिक यक़ीन था जिस पर वह ही छूट गया

मेरे बच्चों माफ़ मुझे कर देना, मजबूरी है
सहनशक्ति अब ख़त्म हुई , भीतर तक टूट गया
- डी एम मिश्र
9 घंटे पहले
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