आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कोई दानव

                
                                                         
                            कोई दानव - सा आकर मेरा घर लूट गया
                                                                 
                            
महँगाई की गाज गिरी, हर सपना टूट गया

कितना घाघ है दफ़्तर का वो बाबू , मत पूछो
सरकारी अनुदान का मेरा हिस्सा लूट गया

बच्चों को भी रोटी अब गिन गिन कर मिलती है
ज़ोर नहीं चलता, जैसे ईश्वर ही रूठ गया

कैसे दाल पकाएँ , बीवी सुबह से पूछ रही
मिट्टी का इक ही बरतन था वह भी फूट गया

मेरे दिल पर क्या बीते ये किसने सोचा है
सबसे अधिक यक़ीन था जिस पर वह ही छूट गया

मेरे बच्चों माफ़ मुझे कर देना, मजबूरी है
सहनशक्ति अब ख़त्म हुई , भीतर तक टूट गया
- डी एम मिश्र
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर