विज्ञापन

वही दीया सुबह तक डेहरी पर टिमटिमाता है

जनवादी ग़ज़लकार

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हसीं हो यार इतना ही नहीं वो बावफ़ा भी हो
        
                                                    
                            
समझदारी भी हो उसमें,वो थोड़ा बावला भी हो

तभी हम मान सकते हैं कि वो इंसान सच्चा है
ग़लत को जब ग़लत कहने की उसमें माद्दा भी हो

वही दीया सुबह तक डेहरी पर टिमटिमाता है
कि जिसमें तेल बाती ही नहीं हो, हौसला भी हो

किसी के सामने क्यों दीन बनकर हाथ फैलाते
खुदा से सिर्फ़ माँगो गर तुम्हें कुछ माँगना भी हो

महज़ पाँवों के होने से सफ़र पूरा नहीं होता
सफ़र के वास्ते इक साफ़ -सुथरा रास्ता भी हो

बंधे रिश्तों की डोरी में बहुत से लोग हैं लेकिन
उसी को मानिए अपना जो सुख- दुख बाँटता भी हो

करें इंसाफ़ जज साहब मगर इतनी गुज़ारिश है
जो जनहित में भी हो लेकिन वो ऐसा फ़ैसला भी हो

उसी फ़नकार को दुनिया अदब से याद रखती है
अलग अंदाज़ हो जिसका , अलग सा दीखता भी हो
- डी एम मिश्र
13 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

User

26 कविताएं

View Profile

Sudhir Khatri

562 कविताएं

View Profile