विज्ञापन

ऐसे हालात में ईमान बचेगा कैसे

जनवादी ग़ज़लकार

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऐसे हालात में ईमान बचेगा कैसे
        
                                                    
                            
सच अकेला है मगर फिर भी झुकेगा कैसे

अब तो सड़कों पे उतरना ही पड़ेगा यारो
ज़ुल्म जब हद से बढ़ेगा तो रुकेगा कैसे

जंग के शोर में मासूम दुआएँ दबतीं
राख के ढेर में फिर फूल खिलेगा कैसे

रोज़ अख़बार में लाशों की ख़बर आती है
अब परिंदों का यहाँ दिल भी लगेगा कैसे

नर्म मिट्टी थी मगर ख़ून से सख़्त हो बैठी
ऐसे मौसम में कोई बीज जमेगा कैसे

माँ ने बच्चों को खिलौनों की तसल्ली दी है
भूखे होंठों पे मगर फूल खिलेगा कैसे

तेरे जाने से मुझे फ़र्क नहीं था लेकिन
इस अँधेरे में कोई चाँद उगेगा कैसे
-एम मिश्र
एक घंटा पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Shivam Awasthi

3 कविताएं

View Profile