31 जनवरी 2017 को तुम देह छोड़ गई,
पर मेरी साँसों में आज भी तुम ही बसी हो।
तुम गई नहीं, यहीं कहीं हो,
मेरी हर धड़कन में, मेरी बातों में हो।
तुम्हारा हँसना, तुम्हारा वो सादापन,
त्याग की मूरत थी, ममता का दर्पण।
कभी शिकायत नहीं, कभी कोई माँग नहीं,
तुमने तो बस देना सीखा, लेना जाना ही नहीं।
घर को मंदिर बनाया, अपने हाथों से,
दीप जलाया तुमने, अपने जज्बातों से।
बच्चों में संस्कार, मुझमें हौसला भर गई,
खुद भूखी रहकर भी, सबका पेट भर गई।
लोग कहते हैं चली गई, मैं कहता हूँ नहीं,
तू तो मेरे ज़हन में पहले से भी ज्यादा वहीं।
तेरी साड़ी की खुशबू, रसोई में आज भी है,
तेरी चूड़ियों की खनक, मेरी रातों में आज भी है।
वादा है तुमसे सुनीता, जब तक साँस चलेगी,
ये जिंदगी सिर्फ तेरी यादों के सहारे चलेगी।
न कोई और आएगा, इस दिल के आँगन में,
तुम थी, तुम हो, तुम ही रहोगी इस जीवन में।
तुम देह नहीं थी, तुम तो मेरी आत्मा हो,
मेरे हर शब्द में, मेरी हर कविता हो।
- जगदीश प्रसाद शर्मा