ऋषि उद्दालक का यज्ञ हुआ, सब दान का संकल्प लिया,
बूढ़ी गायें दान में देख, नचिकेता ने प्रश्न किया।
पिता मुझे किसको दोगे, बार-बार यही पूछा,
क्रोध में पिता बोले - तुझे मृत्यु को दान किया।
पिता वचन को मान, बालक यम द्वार पर आया,
तीन दिवस तक भूखा-प्यासा, द्वार पर ही ठहराया।
यम आए प्रसन्न हुए, बोले मांगो तीन वरदान,
बालक ने पहला माँगा - पिता क्षमा करें, दें फिर से प्यार महान।
दूसरा वर स्वर्ग-मार्ग की, अग्नि-विद्या ज्ञान दो,
यज्ञ की वो विधि बता दो, जो स्वर्ग का मान दो।
यम ने दोनों दे दिए, बोले मांगो तीसरा,
नचिकेता बोला - मृत्यु के पार क्या है, बताओ रहस्य सारा।
कुछ कहते आत्मा रहती, कुछ कहते नहीं रहती,
सत्य क्या है मृत्यु के बाद, यही जिज्ञासा कहती।
यम ने प्रलोभन दिया - आयु लो, धन लो, राज्य लो,
अप्सराएँ लो, सुख लो, पर ये प्रश्न छोड़ दो।
नचिकेता अडिग रहा, बोला - क्षणिक न चाहिए,
मुझे तो शाश्वत सत्य का, अमृत चाहिए।
तब यम ने भेद बताया, श्रेय और प्रेय का,
एक कल्याण का मार्ग, एक क्षणिक प्रेय का।
प्रेय है मीठा, पर अंत में विष समान,
श्रेय है कठिन, पर दे मोक्ष महान।
सुनो नचिकेता, आत्मा अजर अमर है,
न जन्म लेती, न मरती, नित्य निरंतर है।
शस्त्र इसे काटे नहीं, अग्नि जला न पाए,
जो इसे जान लेता, मृत्यु से मुक्त हो जाए।
यही है वो ज्ञान, जो भय को हरता है,
यम और नचिकेता का संवाद, अमरता देता है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा