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शत्रु देख कर परखा जाता है मनुष्य

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सुना है ज्ञानी जन कहते ऐसी बात,
        
                                                    
                            
मित्रता कर लेना सबसे, इसमें क्या आघात।

छोटे से कर ले, बराबर से कर ले,
दीन से कर ले, चाहे दिल भर ले।
मित्र तो सहारा है, मित्र तो छाया है,
मित्रता में ऊँच नीच का कैसा साया है।

पर बात शत्रुता की जब आये,
तो पग जरा सोच समझ कर जाये।

शत्रु कभी छोटा चुनना नहीं,
गली के कुत्ते से भिड़ना नहीं।
शेर से बैर करे तो भी शोभा है,
गीदड़ से जीते तो क्या शोभा है।

क्योंकि ये जग बड़ा सयाना है,
तरीका इसका बड़ा पुराना है।

जग तेरे मित्रों से तुझे न आंकेगा,
कौन तेरे साथ बैठा, क्या झांकेगा।
तेरी थाली में कौन है, नहीं देखेगा,
तेरी मित्रता का मोल नहीं लेखेगा।

पर जब देखेगा तेरे शत्रु कौन हैं,
कितने बलशाली, कितने विद्वान हैं,
कितने ऊँचे, कितने महान हैं,
तब समझेगा तू कितना बलवान है।

रावण से बैर किया तो राम कहाये,
कंस से बैरा तो श्याम कहाये।
अर्जुन ने भीष्म से टक्कर ली,
तभी तो गीता अमर कर दी।

कायरों से लड़कर क्या पायेगा,
जीतेगा भी तो क्या कहलायेगा।
पर ज्ञानी से जो बैर ठान लेगा,
हारेगा भी तो ज्ञान पा लेगा।

शत्रु का वार भी उपहार बनेगा,
तुझको मांज कर तलवार बनेगा।
छोटा शत्रु अहंकार बढ़ायेगा,
बड़ा शत्रु संस्कार सिखायेगा।

इसलिए हे मित्र, ये गांठ बाँध ले,
मित्रता कहीं भी, कभी भी साध ले।
पर शत्रुता करे तो योग्य से करना,
ऊँचे पर्वत से ही टकरा कर झरना।

तभी तो दुनिया तुझे पहचानेगी,
तेरे शत्रु देख तेरी ऊँचाई जानेगी।
मित्र तो तेरी करुणा का प्रमाण हैं,
शत्रु ही तेरे व्यक्तित्व के प्रमाण हैं।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
5 घंटे पहले
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