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सड़क किनारे की वो बेंच

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            "सड़क किनारे की वो बेंच"
        
                                                    
                            

नई नौकरी, थोड़ा वेतन, उम्मीदें बड़ी थीं,
बहनों की शादी कर्ज लेकर, पूरी कर दी थी।

रिश्तेदारों ने भाई को, भड़का कर माँग कराई,
कर्ज में था, न मना कर सका, न कर पाई।

पत्नी बनी सहारा, हर गम समझती थी,
मेरी हिम्मत बनकर, मुझे संभालती थी।

रोज़ नौकरी को जाता, आँखें भर आती थीं,
रस्ते की इक बेंच पर, साँसें ठहर जाती थीं।

आँसू वहीं पोंछे, हिम्मत वहीं पाई,
वो बेंच नहीं, मेरे जीने की दवाई थी।

सड़क पर बैठना, खुद को न भाता था,
उस बेंच ने ही गिरते को, चलना सिखाया था।
-- जगदीश प्रसाद शर्मा
एक महीने पहले
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