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मृत्यु से बड़ा बिछोह है

Jagdish Prasad

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                            "मृत्यु से बड़ा बिछोह है"
        
                                                    
                            

मृत्यु से भी बड़ा है, प्रेम में बिछड़ना,
मृत्यु में है मुक्ति, प्रेम में है सिसकना।

मृत्यु आए तो क्षण भर में प्राण हर लेती है,
देह को जला के, पीड़ा का अंत कर देती है,
एक बार रोते हैं, फिर मन मान जाता है,
समय के साथ घाव, धीरे-धीरे भर जाता है।

पर प्रेम का बिछोह तो, इससे भी गहरा है,
जिस्म जिंदा रहता है, पर मन तो ठहरा है,
वो है कहीं पर, पर मेरे पास नहीं है,
ये कैसी सजा है, जिसका अंत नहीं है।

मृत्यु में तो काया ही, चिता में जलती है,
जुदाई में तो आत्मा, उम्र भर जलती है,
मृत्यु का शोक है, एक नियत विलाप है,
जुदाई का शोक तो, अनंत अभिशाप है।

मृत्यु कहती है - "चलो, अब तो अंत हुआ",
प्रेम की जुदाई कहती - "अंत तो कभी न हुआ",
एक में चिता है, जहाँ गंगा बहा सकते हैं,
दूसरे में यादें हैं, जिन्हें रोज गले लगाते हैं।

इसीलिए कहता हूँ, सुनो ऐ दिल वालों,
इश्क करना तो, पहले ये सोच लेना,
मरना बेहतर है, इस जुदाई से तो,
क्योंकि मरने वाला एक दिन मरता है,
बिछड़ने वाला हर दिन मरता है।
-- जगदीश प्रसाद शर्मा
एक महीने पहले
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