जिंदगी एक भ्रम है, मृत्यु ही हकीकत है,
सत्य यही अंतिम है, बाकी सब माया की नजाकत है।
जैसे निशा में हम कोई सपना देखते हैं,
महलों में उड़ते हैं, फूलों को सहते हैं,
आँख खुले तो मुट्ठी में कुछ भी नहीं रहता,
वैसे ही धरा पर आना, एक कहानी कहता।
हम आए हैं यहाँ, एक किरदार निभाने को,
कुछ दिन का है मेला, फिर है चले जाने को,
ये तन एक वस्त्र है, आत्मा ही तो परिधान है,
मिट्टी तो मिट्टी में मिलेगी, आत्मा ही महान है।
ये रिश्ते-नाते, धन-दौलत, सब स्वप्न के सामान हैं,
आँख मूंदी तो क्या अपना, सब झूठे अरमान हैं,
जिसे तू अपना कहता, वो तेरा साया भी नहीं,
अंत समय में संग चलेगा, तेरा कर्मों के सिवा कोई नहीं।
जैसे रेल के डिब्बे में कुछ मुसाफिर मिलते हैं,
हँसते-गाते, रोते-रूठते, फिर स्टेशन आते ही बिछड़ते हैं,
वैसे ही जीवन की गाड़ी में हम सब मिले हैं,
सबका अपना-अपना लोक, सबको वहाँ जाना पड़ा है।
तू क्यों रोता है पगले, इस मिथ्या संसार के लिए,
जो आया है वो जाएगा, यह विधान है सार के लिए,
तू देह नहीं है, तू तो उससे भी आगे है,
तू उस लोक का वासी, जो काल से भी आगे है।
तो जाग मुसाफिर, अभी भी समय है, आँखें खोल ले,
इस भ्रम की नींद से खुद को थोड़ा टटोल ले,
जब आँख खुलेगी तेरी, तू अपने लोक जाएगा,
यह भ्रम टूटेगा तब, तू स्वयं को ही पाएगा।
इसलिए कहता हूँ -
मैं शरीर नहीं हूँ, मैं तो एक एहसास हूँ,
मिट्टी के इस पुतले में, मैं अमर प्रकाश हूँ।
जिंदगी एक सपना है, देख रहा हूँ मैं,
मर कर नहीं, जीते-जी ही, जाग रहा हूँ मैं।