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एक ही लहर के दो नाम

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            "एक ही लहर के दो नाम"
        
                                                    
                            

जीवन के नियम बड़े ही अद्भुत सारे हैं,
सुख-दुःख तो बस एक ही नदी के किनारे हैं।
एक ही है उत्तेजना, बस नाम अलग हैं,
एक को सुख कहा, एक को दुःख कहा अलग है।

पसंद आ गई तो उसी को सुख कहते हो,
नापसंद हुई तो उसी को दुःख कहते हो,
लहर वही है, बस देखने का फर्क है,
मन की ही तो ये पसंद-नापसंद का तर्क है।

जैसे बिजली चमके, कोई डरे कोई नाचे,
कोई सावन में रोए, कोई सावन में बांचे,
घटना तो वही है, अर्थ तुम देते हो,
अपने ही मन से, रंग तुम भरते हो।

सुख भी एक तरंग, दुःख भी एक तरंग है,
दोनों ही तो समय की झील में उमंग है,
उठती हैं, गिरती हैं, फिर शांत हो जाती हैं,
आती हैं, जाती हैं, निशान छोड़ जाती हैं।

तुम झील नहीं हो, तुम तो किनारा हो,
तरंगों से ऊपर, तुम ही तो सहारा हो,
तरंगों में मत बहो, साक्षी बनकर देखो,
सुख आए दुःख आए, बस देखते ही देखो।

जिस दिन ये समझा, उस दिन मुक्ति है,
न सुख की चाह, न दुःख से विरक्ति है,
वो समता में जीता, वो ही ज्ञानी है,
उसके लिए सुख-दुःख दोनों पानी-पानी है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
एक महीने पहले
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