"दिखावे का त्यौहार"
सोच रहा हूँ ये कैसा त्यौहार हो गया है,
सनातन अब बाजार का हार हो गया है।
जो संस्कार आत्मा में बसे थे कभी,
वो अब नुमाइश में फंसे हैं सभी।
व्रत रखना पावन था, तप की बात थी,
अब मेंहदी, उबटन, फेसियल के साथ है।
नयी ड्रेस, नये गहने लाने पड़ेंगे,
पूजा की थाली भी नयी सजाने पड़ेंगे।
छलनी भी नयी, सजावट भी जरूरी है,
बिना गिफ्ट के तो व्रत अधूरी है।
इतना करके भी मन कहाँ भरता है,
रील न बने तो व्रत कैसे पूरा करता है?
यूट्यूब, इंस्टा, फेसबुक पर डालना है,
लाइक, कमेंट से व्रत को तौलना है।
एक देख कर दूसरा वही करता है,
बाजार हँसता है, संस्कार मरता है।
सोचो जरा, जो खर्च न कर पाएगा,
वह अपना त्यौहार फिर कैसे मनाएगा?
वो गरीब माँ क्या करवा चौथ न करेगी,
बिना सजावट क्या पति की उम्र न बढ़ेगी?
जन्मदिन पहले पूजा से होता था,
तिलक, चरण-स्पर्श से होता था।
अब वो सब पिछड़ापन कहलाता है,
केक, गुब्बारे, मोमबत्ती में इतराता है।
फूंक मार दी, जिसे जलाना था,
काट दिया, जिसे बाँट कर खाना था।
आशीर्वाद की जगह गिफ्ट गिना जाता है,
बाजार का कोड अब धर्म सिखाता है।
हर त्यौहार का अलग ड्रेस कोड है,
हर इवेंट का अलग गिफ्ट मोड है।
होली, दिवाली, तीज, करवा चौथ,
बाजार ने सबको निचोड़ लिया है।
ये कैसा सनातन, कैसा हिन्दुत्व हो गया,
मन से नहीं, दिखावे में खो गया।
त्यौहार तो मन से मनाया जाता है,
दिखावे से नहीं, तप से सजाया जाता है।
लौट चलो फिर से उस आंगन में,
जहाँ त्यौहार बसता था मन में।
जहाँ प्रेम था, दिखावा नहीं था,
बाजार नहीं था, बस भाव था।
- जगदीश प्रसाद शर्मा