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व्यापारी की नज़र

Jagdish chandra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            डरो मत, जो कहना है कह दो, मियाँ मुझे,
        
                                                    
                            
रास्ता मेरा कहाँ है? मालूम नहीं क्या मुझे।

अट्टालिका से निकाल दिया था तुमने कभी,
फिर क्यों पकड़ा दी हवेली की चाबियाँ मुझे।

थामकर रखते हैं लोग आस्तीन में ज़हरीले साँप,
संभालकर रखना आया नहीं चालाकियाँ मुझे।

मैंने तो रिश्तों को हमेशा ही अमानत समझा,
लोग हर रिश्ते में क्यों ढूँढ़ते रहे नफ़ा मुझे?

मैंने बाज़ार में अपनी कीमत नहीं लगने दी,
लोग कहते रहे कि आता नहीं सौदा मुझे।

जिसने गिरने की दुआ की थी मेरे हिस्से में,
वक़्त ने उसी के दर पर पहुँचा दिया मुझे।

अब न शिकायत है किसी से, न कोई शिकवा,
जिसने जैसा समझा, वैसा ही मिला मुझे।

मैंने काँटों से भी रिश्ते निभाए हैं लेकिन,
फूल बनकर भी किसी ने, न समझा मुझे।

व्यापारी की नज़र से देखा सबने, "जगदीश"
ग़ज़लें कमाकर दे न सकीं, तो छोड़ दिया मुझे।
- जगदीश चंद्र कापड़ी
12 घंटे पहले
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