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कुमाऊँ की इस मिट्टी को बार-बार प्रणाम करता हूँ

Jagdish chandra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आँखें बंद करके जब मैं रंग-बिरंगी देखता हूँ,
        
                                                    
                            
तो कुमाऊँ की अपनी पलटन जंगी देखता हूँ।
इतिहास के पन्नों में हिन्दू वीरों की तंगी देखता हूँ,
आक्रांता तुगलक, खिलजी, मुगल, फिरंगी देखता हूँ।
लोहित का कतरा-कतरा भारत के नाम करता हूँ,
कुमाऊँ की इस मिट्टी को बार-बार प्रणाम करता हूँ।

कभी वर्दी में सजी वीरता की ज़िंदगी देखता हूँ,
कभी विदाई के पलों में आँखों की नमी देखता हूँ।
जंगी पलटन की यही तो मैं बंदगी देखता हूँ,
वरिष्ठ-कनिष्ठ में देशप्रेम की सादगी देखता हूँ।
मेरा उद्घोष है—अपनी जवानी राष्ट्र को दान करता हूँ,
कुमाऊँ की इस मिट्टी को बार-बार प्रणाम करता हूँ।

ज्वाला से निकली दोधारी तलवार देखता हूँ,
माटी के लिए मिटता हुआ, परिवार देखता हूँ।
प्रचंड वीरों का दमदार प्रहार देखता हूँ,
शत्रु को संगीन से चीरती ललकार देखता हूँ।
रणभूमि में जीत का आगाज़ सरेआम करता हूँ,
कुमाऊँ की इस मिट्टी को बार-बार प्रणाम करता हूँ।

सरहद पर खड़ा वीर जवान देखता हूँ,
तपते रेगिस्तान में भी सीना तान देखता हूँ।
माँ की आँखों में बेटे का अभिमान देखता हूँ,
बाप के सपनों का पूरा सम्मान देखता हूँ।
सपनों में भी शत्रु का, मैं काम तमाम करता हूँ,
कुमाऊँ की इस मिट्टी को बार-बार प्रणाम करता हूँ।

पत्नी की आँखों में छुपा इंतज़ार देखता हूँ,
बच्चों की मुस्कान में पिता का प्यार देखता हूँ।
गाँव की खुशबू में दोस्तों का संसार देखता हूँ,
अवकाश के दिनों में ही अपना परिवार देखता हूँ।
राह तकती आँखों के नाम, अपना कलाम करता हूँ,
कुमाऊँ की इस मिट्टी को बार-बार प्रणाम करता हूँ।

जब तिरंगे में लिपटा कोई वीर जवान देखता हूँ,
आँखों में ठहरा बादलों का आसमान देखता हूँ।
आँखें खोलूँ तो सामने हिंदुस्तान देखता हूँ,
आँखें बंद करूँ तो पल्टन का सम्मान देखता हूँ।
माँ भारती के चरणों में जीवन निष्काम करता हूँ,
कुमाऊँ की इस मिट्टी को बार-बार प्रणाम करता हूँ।
2 महीने पहले
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