विदेशी आक्रांता की आभा को इतिहास से मिटाता हूँ।
फिर से, मैं फिर से, हिन्दू वीरों को दोहराता हूँ।
तीव्र निगाहें, प्रबल भुजाएँ एक आर्य था।
महासम्राट अशोक नाम से एक मौर्य था।
धरम का मोड ऐसा कलिंग युद्ध से आया।
जम्बू द्वीप, श्रीलंका तक बौद्ध धर्म फैलाया।
समुद्रगुप्त ने मानो जैसे फिर सतयुग बुलाया।
अश्वमेघ यज्ञ के आयोजन से स्वर्णयुग लाया।
न्याय, समता, लोक कल्याण ऐसा किया।
बोली प्रजा- "महाराजाधिराज नवयुग लाया।"
मंदिर भव्य बनाये, जब राजेंद्र चोल ने।
अवतार नया दिखाया दक्षिण के भूगोल ने।
गच्चा खाया इंडोनेशिया, मलेशिया के अडोल ने।
नौसेना होती क्या है? बताया राजेंद्र चोल ने।
रायचूर, दोआब, उदयगिरि को लपेटा।
बीजापुर, उड़ीसा, गोलकुंडा को समेटा।
लाखों हिन्दू बचाए इस्लामी चुंगल से जिसने-
कृष्णदेव राय जैसे वीर-योद्धा भारत ने जने।
विदेशी आक्रांता की आभा को इतिहास से मिटाता हूँ।
फिर से, मैं फिर से, हिन्दू वीरों को दोहराता हूँ।
चौहान के शौर्य का तराईन मे युद्ध प्रथम था।
माफ किया सत्रह बार गौरी को, क्या ये कम था?
पराक्रम चरम था, तथापि पृथ्वीराज नरम था।
गद्दार निकला जयचंद, वरना गौरी खतम था।
मेवाड़ भूमि पर कुर्बानी की बुलंद कहानी है।
युगो-युगो से महाराणा का रण अभिमानी है।
इतिहास हल्दी-घाटी का, याद हमें मुह-जुबानी है।
गोरिल्ला के रण में सिंहासन की कुर्बानी है।
चेतक के बलिदान में प्रचंड जीत की निशानी है।
रोते-रोते बोला अकबर- "ये कैसा हिन्दुस्तानी है?
ये कैसा हिन्दुस्तानी है?"
देश-धरम पर मिटने वाला एक हिन्दू-वीर था।
परम प्रतापी छत्रपति, स्वराज पर गंभीर था।
मुगलों के अतांक जब भारत में फलक रहे थे।
बनकर कंटक मराठा, औरंग के निकट रहे थे।
विदेशी आक्रांता की आभा को इतिहास से मिटाता हूँ।
फिर से, मैं फिर से, हिन्दू वीरों को दोहराता हूँ।
-जगदीश चन्द्र कापड़ी