फूले फूल नहीं बगिया में, फिर कैसे मधुमास कहूँ मैं /
कर ना सका अनुप्राणित तन को, क्या मलयज वातास कहूँ मैं
सुगनो की हरियाली लेकर हरित हुई है गुल्म लताएं,
विरही बरगद तप करता है, बढ़ी हुई है जटिल जटाएं
इस डाली से उस डाली पर, फेरे कोयल डाल रही है
कह कर कुहुँ कुहुँ निर्मोहिन, अंतरमन को साल रही है
रंग रहित आँगन चौबारे, क्या फागुन का मास कहूँ मैं
फूले फूल नहीं बगिया में , फिर कैसे मधुमास कहूँ मैं
नीरवता में गहन विपिन-पथ,
राह अकेला निरख रहा है
होकर हाय ! बावली आशा,
चली गई, मन विलख रहा है
बेला की कलियाँ हैं मानो,
जमीं हुई आँसू की लड़ियाँ
मधुपों को मधुपान कहाँ अब,
व्याकुल हैं जीवन की घड़ियाँ
अलि रसहीन अधर सूखे जब,क्या कलियों का हास कहूँ मैं
फूले फूल नहीं बगिया में, फिर कैसे मधुमास कहूँ मैं
वासंती रंग सारी सर पर,
सरसों झूम रही मदमाती
आलिंगन करता जब मारुति,
सरमा जाती, झुक झुक जाती
ठूठ खड़ा निर्वस्त्र मेड़ पर,
उस पल की सुधियाँ हैं आतीं
ना जाने कितनी गिलहरियाँ,
आतीं थी रस ले ले जातीं
बुझ जाएगी प्यास हृदय की, है जीवन में आस कहूँ मैं
फूले फूल नहीं बगिया में, फिर कैसे मधुमास कहूँ मैं
-डॉ जयद्रथ यादव (अचिन्त्य )
B/54 राजीव नगर,यशोदा नगर,कानपुर नगर pin208011
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