जामुन की शाख पर
गुरसल चिड़िया ने बुना था सपना,
घोंसले में दो नन्हें जीवन
पंखों में भर रहे थे आकाश की चाह।
धरती पर उतरकर
कभी धूप, कभी पत्तों से बातें करते,
छोटे-छोटे कदमों से
सीख रहे थे उड़ान की भाषा।
पर कल रात…
एक साया आया चुपके से,
काली स्याही में लिपटी मौत
बिल्ली बनकर ले गई मासूम उम्मीदें।
मैं दौड़ा,
पर बहुत देर हो चुकी थी।
नन्हा जीवन—
एक माँ की आंखों से ओझल हो गया।
सुबह की पहली किरण में
वो फिर आई...
मुंह में दाना, आंखों में इंतज़ार,
चीं-चीं करती,
हर कोने में ढूंढ रही थी अपना चाँद।
कभी झाड़ियों के पीछे,
कभी नीले डिब्बे के पास
वह तलाशती रही—
उस आवाज़ को
जो अब कभी नहीं लौटेगी।
कलेजा काँप गया मेरा
उसकी टोहती निगाहें देख,
काश मैं कुछ कर पाता,
काश उस रात
ज़िंदगी बचा पाता।
अब वह घोंसला
खाली नहीं,
एक शोकगीत से भरा है
जो हर हवा के झोंके में
फिर से गूंज उठता है।
- इस्लाम अली