आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एक माँ की चीख

                
                                                         
                            जामुन की शाख पर
                                                                 
                            
गुरसल चिड़िया ने बुना था सपना,
घोंसले में दो नन्हें जीवन
पंखों में भर रहे थे आकाश की चाह।

धरती पर उतरकर
कभी धूप, कभी पत्तों से बातें करते,
छोटे-छोटे कदमों से
सीख रहे थे उड़ान की भाषा।

पर कल रात…
एक साया आया चुपके से,
काली स्याही में लिपटी मौत
बिल्ली बनकर ले गई मासूम उम्मीदें।

मैं दौड़ा,
पर बहुत देर हो चुकी थी।
नन्हा जीवन—
एक माँ की आंखों से ओझल हो गया।

सुबह की पहली किरण में
वो फिर आई...
मुंह में दाना, आंखों में इंतज़ार,
चीं-चीं करती,
हर कोने में ढूंढ रही थी अपना चाँद।

कभी झाड़ियों के पीछे,
कभी नीले डिब्बे के पास
वह तलाशती रही—
उस आवाज़ को
जो अब कभी नहीं लौटेगी।

कलेजा काँप गया मेरा
उसकी टोहती निगाहें देख,
काश मैं कुछ कर पाता,
काश उस रात
ज़िंदगी बचा पाता।

अब वह घोंसला
खाली नहीं,
एक शोकगीत से भरा है
जो हर हवा के झोंके में
फिर से गूंज उठता है।
- इस्लाम अली
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर