कर कुटिलता का तू परित्याग,
बन जा मनुज निश्छल विशेष।
फैले चहुँ ओर तेरा कीर्तिमान,
देखे ब्रह्माण्ड तुझको निर्निमेष।
वैभव, ऐश्वर्य है क्षणभंगुर,
नहीं होंगी तेरी सहचारी।
तू स्नेह चक्रव्यूह से बाहर निकल,
वैराग्य की कर तू तैयारी।
रख मानुषता को सर्वश्रेष्ठ तू,
श्री कृष्ण ने यह उपदेश दिया।
भगवान श्रीराम सा बन आज्ञाकारी,
चौदह वर्ष का था वनवास लिया।
क्रोध को तू बना ले दास,
यह विवेक का करता है नाश।
यदि विवेक नहीं तो होगा पतन,
क्रोध का कुछ कर जतन।
- इस्लाम अली
कवि एवं पत्रकार
हरिद्वार,उत्तराखण्ड