आरज़ू ए दिल की अब आरज़ू कुछ भी नहीं
हैं शिकवे ज़िंदगी से मगर अब शिकायत कुछ भी नहीं
खोलकर रख दी उसने किताब ए ज़िंदगी सामने मेरे
ले पढ़ ले मुझको इसमें तेरे सिवा कुछ भी नहीं
कर तो लिया था खुद को खुदा की तरफ़ रूजू मैंने
मगर कैसे हो ये यकी की सवाब ए तलब कुछ भी नहीं
करता रहा उम्र भर नगीनो से नगीनो की तरास
तब जाके हुआ ये मालूम तुझसे नायाब कुछ भी नहीं
अब तो गुज़रेगी इस्लाम बस इसी ख्वाब में जिंदगी
तदवीन ए ख्वाब था मैं अब ख्वाबों में कुछ भी नहीं
Writen by I.S. Choudhary
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