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कसम तुम प्यार कि खाओ कि मज़ा आ जाए।

Iqbal mehdi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कसम तुम प्यार कि खाओ कि मज़ा आ जाए।
        
                                                    
                            
कोई नग़मा ही सुनाओ कि मज़ा आ जाए ।।

न कोई हो, न किसी आने की उम्मीद ही हो ।
ऐसी तन्हाई में आओ कि मज़ा आ जाए।।

दिल का बात जुबां से तुम जारी कर दो ।
राज़ ऐसा तुम बताओं कि मज़ा आ जाए।।

राज़ कहते हुए जो तुमको लाज आ जाए ।
मेरी बाहों में सिमट जाओ कि मज़ा आ जाए ।।

लग के सीने से सभी दूरियां खतम कर दो ।
लबों से लब यू लगाओ कि मज़ा आ जाए।।

ना हम काबू में रहें और न सांसे अपनी ।
साथ ऐसा तुम निभाओ कि मज़ा आ जाए।।

न दूर खिसके और न ही करवटें बदलें।
साथ अपने यूं सुलाओ कि मज़ा आ जाए।।

न अलग हो कभी उससे ये खुशबू तेरी ।
तुम यूं "मेंहदी" में समाओ कि मज़ा आ जाए।।
एक घंटा पहले
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