बचना चाहे कितना भी हम , क्या सच मे बच पाते है
बाग लगाने वाले ही , फूल चुराने आते हैं।
दंभ भरू कितना भी मैं, मेरे जैसे प्रतिदिन आते जाते हैं।
हम कुछ-कुछ पाने की खातिर, कितना कुछ खो जाते हैं।
मुझको मैं बनाने को कुछ लोग बहुत जरूरी हैं।
विष का तोड़ बनाने को , विषधर ही पाले जाते हैं।