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मन बंजारा गाए

Indra Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये मन बंजारा गाए कुछ गीत सुहाने।
        
                                                    
                            
कुछ छेड़ रहा है अपने ही राग पुराने।

है व्यथा उमड़ कर मन की, गीतों में आई।
शब्दों ने रो रो करके, है कथा सुनाई।
आँसू बाहर आने को पा गए बहाने।।१॥

हैं वार कर रहे अपने मिलकर के सारे।
जग से तो हम जीते है अपनों से हारे।
जितने भी यहाँ सगे थे निकले बेगाने।।२॥

कितनों ने हमको चाहा पर नहीं निबाहा।
सपने जो हमें दिखाए कर डाले स्वाहा।
अब तो उनको मुँह फेरे हो गए जमाने।।३॥

है सारा ही जग झूठा हमने ये जाना।
जो सत्य निरंतर उसको हमने पहचाना।
रत्नेश उसे गह लगना है हमें ठिकाने।।४॥
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
2 महीने पहले
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