मन के भवन बीच भावना किलोल करै, मुख पे दिखात याको भाव ना वियोग के।
वियोग के प्रकाश में सताय प्रियतम रहे, प्रिय तम लागे सारे लक्षण हैं रोग के।
रोग के निदान हेतु कामना के द्वार पर, खड़ी काम ना सुहात भेद मा प्रयोग के।
भेद मा प्रयोग के फँसी है विधि ना वो पाई, विधिना को कोसि रही मन भाव भोग के।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'