आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मन के भवन बीच भावना

                
                                                         
                            मन के भवन बीच भावना किलोल करै, मुख पे दिखात याको भाव ना वियोग के।
                                                                 
                            
वियोग के प्रकाश में सताय प्रियतम रहे, प्रिय तम लागे सारे लक्षण हैं रोग के।
रोग के निदान हेतु कामना के द्वार पर, खड़ी काम ना सुहात भेद मा प्रयोग के।
भेद मा प्रयोग के फँसी है विधि ना वो पाई, विधिना को कोसि रही मन भाव भोग के।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर