व्योम में बादल छाए हैं।
रसों की मटकी लाए हैं।
रूप मनमोहन का धारे।
इसी से लगते हैं प्यारे।
केश जैसे हों घुँघराले।
बदलते हैं पल पल पाले।
रूप निखरा-सा लगता है,
लगे सज धज कर आए हैं।।१॥
धरा पर जब ये छाते हैं।
सभी हर्षित हो जाते हैं।
खुशी से तरुगन भी झूमें।
धरा को लपक लपक चूमें।
इन्हीं से हरियाली आती,
पवन में शीतलताएँ हैं।।२॥
बरसते हैं जब ये छाकर।
गिरे ज्यों बूँद बान बनकर।
घननघन गर्जन हैं करते।
हृदय में चेतनता भरते।
दामिनी की लपटें मानो,
क्रांति की ये ज्वालाए हैं।।३॥
यही घन धरती का जीवन।
सींचते कृषकों का भी मन।
पेट सरिताओं के भरते।
जलाशय का सूखा हरते।
भरा 'रत्नेश' नीर से है,
हरी सारी पीड़ाए हैं।।४॥
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'