शिकायत करूं कैसे उनसे
मेरी तो फितरत ही शैतानी है
हर बार तौबा करता हूँं
फिर एक नया गुनाह करता हूं
खुद ही उलझाता हूं किस्मत को
फिर हालातो पर हैरान रहता हूं