शिकायत करूं कैसे उनसे
मेरी तो फितरत ही शैतानी है
हर बार तौबा करता हूँं
फिर एक नया गुनाह करता हूं
खुद ही उलझाता हूं किस्मत को
फिर हालातो पर हैरान रहता हूं
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X