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कौन हो तुम

ij singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जाड़ो की गुनगुनी धूप हो तुम
        
                                                    
                            
या ओस की बूंद हो तुम
एक अनकही कथा हो तुम
जितना मैं तुमको समझ पाया
उससे ज्यादा एक रहस्य हो तुम

धरती की जो प्यास बुझाए
बारिश की बूंद हो तुम
न तुममे कोई छल कपर
न कोई दिखावट
हृदय तुम्हारा पाक पवित्र
उज्जवलता से भरा चरित्र

स्नेह भीतर तुम्हारे
कूट कूट कर भरा हुआ
मां की ममता सहन शक्ति तुम्हारी
क्रोध आए तो रणचंडी का रौद्र रूप भी

तुम हो प्यार की एक मूरत
न कुछ खोने का डर तुमको
न कुछ पाने की चाहत
गैरों को भी अपना समझती
न अपनो से कोई शिकायत

ज्ञान तुम्हारी शक्ति
चारित्र तुम्हारा आईना
धैर्य तुम्हारा गहना

जीवन के इस रणक्षेत्र में
नहीं किसी पर हो निर्भर
सत्य के तुम साथ खड़ी हो
अपना सीना ताने
कोई कितने बाण चला ले
कोई कितनी तलवार
एक वार में कर देती हो
सारे वार बेकार

तुम हो आज की स्त्री
करता हूँ मैं तम्हें नमन
करता हूँ मैं तम्हें नमन
3 महीने पहले
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