जाड़ो की गुनगुनी धूप हो तुम
या ओस की बूंद हो तुम
एक अनकही कथा हो तुम
जितना मैं तुमको समझ पाया
उससे ज्यादा एक रहस्य हो तुम
धरती की जो प्यास बुझाए
बारिश की बूंद हो तुम
न तुममे कोई छल कपर
न कोई दिखावट
हृदय तुम्हारा पाक पवित्र
उज्जवलता से भरा चरित्र
स्नेह भीतर तुम्हारे
कूट कूट कर भरा हुआ
मां की ममता सहन शक्ति तुम्हारी
क्रोध आए तो रणचंडी का रौद्र रूप भी
तुम हो प्यार की एक मूरत
न कुछ खोने का डर तुमको
न कुछ पाने की चाहत
गैरों को भी अपना समझती
न अपनो से कोई शिकायत
ज्ञान तुम्हारी शक्ति
चारित्र तुम्हारा आईना
धैर्य तुम्हारा गहना
जीवन के इस रणक्षेत्र में
नहीं किसी पर हो निर्भर
सत्य के तुम साथ खड़ी हो
अपना सीना ताने
कोई कितने बाण चला ले
कोई कितनी तलवार
एक वार में कर देती हो
सारे वार बेकार
तुम हो आज की स्त्री
करता हूँ मैं तम्हें नमन
करता हूँ मैं तम्हें नमन
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