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" काश तुम मेरी होती "

Hridya Khatri

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            काश तुम मेरी होती...
        
                                                    
                            
तो ये शाम सिर्फ़ एक शाम नहीं, इक फ़ना होती।

तेरी क़ुर्बत में सिमट कर तेरा ही हो जाता,
मेरी रूह पर बस तेरे तसव्वुर की पनाह होती।

पिघल जाते तेरे आगोश में हम इस तरह,
कि हर एक साँस में बस ला-ज़वाल तमन्ना होती।

यूँ शामिल हो जाती तू मेरी रूह में आकर,
कि मैं ख़ुद को ढूँढता, और बस तू ही हासिल होती।

तेरी तपिश में कुछ इस शिद्दत से पिघलते हम,
कि हमारी मुलाक़ात ही हमारी आख़िरी सेहर होती।

मेरी हर एक तहरीर में तेरा ही अक्स दिखता,
अगर तू पास होती, तो हर ग़ज़ल मुकम्मल होती।

ये जो सीने में एक ख़लिश है तेरे ना होने की,
गर तू साथ होती, तो ज़िंदगी यूँ ज़हर-आलूद ना होती।

तेरा लम्स मिलता तो ज़माना भूल जाते हम,
हर एक हिज्र की रात, विसाल की सुबह होती।

मगर इस ढलती शाम में फ़क़त एक ख़ामोशी है,
और इसी ख़ामोशी में गूँजती एक सदा होती...
काश तुम मेरी होती।
एक महीने पहले
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