विज्ञापन

एक अधीनता ऐसी भी

Hina Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कमज़ोर आँखें सपने देखती कम हैं...
        
                                                    
                            
काँपते हाथ अब ज़िम्मेदारियाँ उठाते कम हैं...
यूँ तो वो लड़खड़ाते पाँव अपनी मंज़िल तक पहुँच ही जाते हैं...
उनकी वो सहमी आवाज़ ... दवाइयाँ पूछने की हिम्मत कर ही लेती है..
फिर कुछ यूँ भी है...
जब इंसान बुज़ुर्ग हो जाता है... अधीन हो जाता है...
अधीन हो जाता है... किसी की रहम के... हमदर्दी के... तरस के...
 
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3563 कविताएं

View Profile