कमज़ोर आँखें सपने देखती कम हैं...
काँपते हाथ अब ज़िम्मेदारियाँ उठाते कम हैं...
यूँ तो वो लड़खड़ाते पाँव अपनी मंज़िल तक पहुँच ही जाते हैं...
उनकी वो सहमी आवाज़ ... दवाइयाँ पूछने की हिम्मत कर ही लेती है..
फिर कुछ यूँ भी है...
जब इंसान बुज़ुर्ग हो जाता है... अधीन हो जाता है...
अधीन हो जाता है... किसी की रहम के... हमदर्दी के... तरस के...
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