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सफ़रनामा ये कैसा है, कि साथी छूट जाता है

Himanshu Singh Sikarwar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सफ़रनामा ये कैसा है, कि साथी छूट जाता है,
        
                                                    
                            
क़दम आगे निकलते हैं, मगर घर छूट जाता है।

वही हवाएं पेड़ों की, वही क़िस्से, वही रातें,
बड़े होने की कोशिश में, ये बचपन छूट जाता है।

बहुत से ख़त लिखे हमने, मगर भेजे नहीं उनको,
ज़ुबां तक जो नहीं आता, वही सच छूट जाता है।

किसी की राह तकते अब, ये आंखें थक गई हैं दोस्त,
दिया तो जलता रहता है, अँधेरा छूट जाता है।

लिखी है दास्ताँ दिल की, मगर एक बात बाक़ी है,
सभी कुछ मिल तो जाता है, मगर 'दिल' टूट जाता है।
एक महीने पहले
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