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विजय पर्व का गान लिखो तुम - हरवंश हृदय

Harvansh Srivastava

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अभी से इतना व्यथित हो गए
        
                                                    
                            
बिन कारण ही चकित हो गए
चक्र कुचक्र का दौर आएगा
अभी से इतना भ्रमित हो गए
उठो और देखो समर भूमि में
आश्चर्य कितने भरे पड़े हैं
शत्रु पक्ष में सीना ताने
कल तक थे जो मित्र खड़े हैं
देखो तुम संताप न करना
समर त्याग का पाप न करना
ले समय तूलिका निज हाथों में
सबका दण्ड विधान लिखो तुम .....
विजय पर्व का गान लिखो तुम ...!!

प्रखर प्रभंजन से टकराए
देखो दीप न बुझने पाए
बाती बेशक जीर्ण शीर्ण है
लौ की आस न मिटने पाए
है घटा घिरी घनघोर तो क्या
तिमिर त्रास का जोर तो क्या
दीप जल रहा खामोशी से
है अंधकार का शोर तो क्या
ये दीप सहज जलता जायेगा
तम देर तलक न टिक पायेगा
हो शांत चित्त चिंतन प्रवात का
मत आंधी तूफान लिखो तुम .....
विजय पर्व का गान लिखो तुम ...!!

प्रेम में टूटे हो लगता है
भाग्य के फूटे हो लगता है
छिन्न भिन्न विक्षिप्त दिख रहे
खुद से रूठे हो लगता है
नाहक में हैं आंखे नम
आत्मविश्वास हुआ खतम
जो था ही नहीं कभी तुम्हारा
उसके जाने पर कैसा गम
उठो आंख के आंसू पोछो
कर विचार मन में कुछ सोचो
गम की काली रातों के पीछे
नित नूतन सुखद विहान लिखो तुम .....
विजय पर्व का गान लिखो तुम ...!!
- हरवंश हृदय
4 महीने पहले
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