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भगत सिंह - एक सोच, एक जज़्बा

Harsh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            28 सितंबर 1907, एक ऐसे लाल का जन्म होता है,
        
                                                    
                            
जिसकी बदौलत आज ये देश, मर्ज़ी से उठता और सोता है।
हर एक मुकाम में राजगुरु और सुखदेव का पूरा साथ था,
भरी जवानी में कुर्बानी, सोचो उनका आज़ादी में कितना हाथ था।
मौत सुनाने वाला कैसे मिला होगा रब से,
नज़र चुराने के लिए बस एक वजह ये काफ़ी थी।
उस माँ ने कैसे होश संभाले होंगे,
जिसके 23 साल के बच्चे को सज़ा-ए-फ़ाँसी दी।
कि वो उभर आएँगे शासन करने के लिए,
अंग्रेज़ों की सोच बस ज़ंजीर-ए-वहम थी।
आज़ादी लौटा न सकी वीर हमारे,
ये फ़ाँसी की रस्सी इतनी बेरहम थी...
पढ़ जाए जो युवा देश का,
अपनी कलम से आज़ादी, जय हिंद लिखेंगे सब।
देश माँगे कभी कुर्बानी तो,
बच्चे-बच्चे में भगत सिंह दिखेंगे तब। 
2 महीने पहले
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