इस छोटी सी गुड़िया को
पंख नीलाभ तो लगने दो
नन्ही सी इस दुनिया में,
खेल रही भोली-भाली,
देख-देख सुकुमारी को,
जागी मन में एक विहाली।
कहती है यह मूक बालिका,
मुझको भी नभ चलने दो,
इस छोटी सी गुड़िया को,
पंख नीलाभ तो लगने दो।
घर आँगन की इस माटी में,
रची-बसी है प्यारी माया,
इसने अपनी छोटी आँखों,
नया गगन है रोज सजाया।
रोक न कोई इसके पथ को,
स्वप्न प्रखर सच पलने दो,
इस छोटी सी गुड़िया को,
पंख नीलाभ तो लगने दो।
चाह रही यह नभ छूना,
लेकर मन में तन दूना,
दूर क्षितिज के पारों तक,
जाना इसने ठानी हूँ ना ।
हवा कहे तुम रुकना मत,
अमृत रस में ढलने दो,
इस छोटी सी गुड़िया को,
पंख नीलाभ तो लगने दो।
रंग बिरंगे इसके सपने,
जैसे कोई चित्र सुनहरा,
भर ले अपनी इन मुट्ठी में,
यह नीला और खुला सवेरा।
मौन तोड़ कर बाधाओं का,
स्वर कलियों को खिलने दो,
इस छोटी सी गुड़िया को,
पंख नीलाभ तो लगने दो।
स्नेह सलिला सी बहती है,
इसके पग की हर इक आहट,
देखि जब इसकी कोमलता
मिट जाती मन की हर आहट।
बने प्रेरणा इन आँखों की,
दीप स्नेह का जलने दो,
इस छोटी सी गुड़िया को,
पंख नीलाभ तो लगने दो।
जीवन की इस कठिन डगर पर,
थाम उँगली जो आगे आई,
दे दो इसको संबल ऐसा,
करे जगत में नई सगाई।
विश्वासों की इस बगिया में,
फूल प्यार के खिलने दो,
इस छोटी सी गुड़िया को,
पंख नीलाभ तो लगने दो।
सीमाएं सब तोड़ ताड़ कर,
यह तो पहुँचेगी उस तारे,
संग-संग इसके गाएँगे सब,
अंबर के उजले उजियारे।
लक्ष्य सामने इसके आया,
अब इसको आगे बढ़ने दो,
इस छोटी सी गुड़िया को,
पंख नीलाभ तो लगने दो।
देखें जब यह नीला गगन तो,
खुशी से इसका मन भर आए,
अपनी इन छोटी कोमलता से,
यह सारा संसार झुकाए।
साहस के इस पावन रथ पर,
इसे विजय पथ चलने दो,
इस छोटी सी गुड़िया को,
पंख नीलाभ तो लगने दो।