मेरी आंखों ने उजाले में एक चेहरा देखा
वो चेहरा इतना दिव्य था
मानो मेरी आंखों ने देवताओं का उस पर
भव्य पहरा देखा।
जब उसके अधरों पर मुस्कान देखी
ख़ुशी खुद पर ही होते शर्मसार देखी
अपनी आंखों की ज्योति को उसकी आंखों की ज्योति के सम्मुख क्षीण होते देखा
मानो सूर्य के सम्मुख अंधों की भीड़ होते देखा
मोतियों से दांत उसके निर्मित थे घने
मानो तारों की आकाश में माला बने
मेरी आंखों ने उजाले में उस चेहरे पर तरुणाई देखी
मेरी आंखों ने उजाले में उस चेहरे के कपोलों पर अरूणाई देखी।।
-हरिकेश यादव
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