तुम तो मेरी तसव्वुर थीं, मेरी तबस्सुम थीं!
अगर तुम्हें जाना ही था तो बेदार करके जाते
मुझे पामाल करने की क्या ज़रूरत थी?
तुम तो मेरी ज़िंदगी की नफ़्स थीं
तुम तो नज़ाफ़त की निज़ाम थीं
तुम तो मेरी तसव्वुर थीं, मेरी तबस्सुम थीं
तेरे लबों पर जब इश्क़ के तराने आते थे
तो मेरे इश्क़ में ज़फ़र का ज़िक़्र हो उठता था
तेरे लबों पर शबनम की भांति इश्क़ ए जज़्ब
परिलक्षित होने लगता था
जानता हूं मैं कि सारी दुनिया तेरी पाकीज़गी की
सजदा करती है
अब भी तेरी यादों की ख़लिश मुझे उकुबत देती है
तेरे चेहरे पर आब ए आइना दिखता है
फिर भी न जाने क्यों मैं आज़र्दआह होकर बैठा हूं ?
कोई असबाब तो ज़रूर होगा !
हरिकेश यादव
काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी
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