प्यार का मौसम था सिर्फ़ मैं बोला
इज़हार का मौसम था सिर्फ़ मैं बोला
नफ़रत की निशा थी सिर्फ़ वो बोली
इनकार की फिज़ा थी सिर्फ़ वो बोली
प्यार का मेरा घोसला था
जाने का उसका फ़ैसला था
वो मेरे साथ रह भी न पाए
हमसफ़र थे मेरे वो पर हम ही उनसे कुछ कह भी न पाए
हमनें कभी समझा ही नहीं उन्हें बेवफा
फिर न जाने क्यों हुए वो हम से खफा
हरिकेश यादव
काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी
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