वो जो इश्क़ का इज़हार करता था
ख़ुद से भी ज़्यादा मुझे प्यार करता था
वो जो बगैर मेरे पल भर रह नहीं पाता था
वो जो मुझे अपनी गज़ल समझता था
चांद को मेरी नकल समझता था
वो जो बगैर मेरे सो नहीं पाता था
वो जो बगैर मेरे हंस नहीं पाता था
वो जो बगैर मेरे बेचैन हो जाता था
वो जो बगैर मेरे बे नैन हो जाता था
वो जिसकी सांसे बगैर मेरे थम सी जाती थी
वो जिसकी बातें बग़ैर मेरे सहम सी जाती थी
मतलब वो जिसकी दुनिया थी मैं
आज उसी ने मुझे कहा -
क्या मेरे जिस्म से खेलने के बाद
मैं .... हो गई?
आज इश्क़ से इतबार उठ गया
आज मेरे होठों से उसका नाम रुठ गया ।
हरिकेश यादव
काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी
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