कोई प्यार का तराना गा रहा है
कोई आज़ादी चाहता है
कोई शाबाशी चाहता है
कोई धन इकट्ठा कर रहा है
कोई राजनीति के रण भूमि का आवंटन करना चाहता है
कोई अपने बच्चों की मुस्कान के लिए मसक्कत कर रहा है
कोई टिप्पणी कर रहा है आज के समय की
कोई घर संसार की रचना कर रहा है
अगर कहूं तो सब अपने अपने फ़ायदे की सोच रहे हैं
मैं गांव की एक बढ़िया हूं
ख़राब हूं मैं न कि बढ़िया हूं
बेटा मेरा शराबी है
लोग कहते हैं कि वह मेरी बरबादी है
घर में एक निवाला भी नहीं है
बेटा मेरा पूछता है मुझसे कि मां क्या आस पास कोई मधुशाला नहीं है?
मां हूं निवाला भी ढूंढ रही हूं और मधुशाला भी
कोई टिप्पणी कर रहा है मुझ पर तो कोई ताने दे रहा है
आज एक गांव में गई थी निवाला ढूंढ ने
किसी ने इज्ज़त नहीं दी
एक नई उम्र का लड़का था
उसने कुर्सी भी दी बैठने के लिए
और निवाला भी
पर मैं कर्म जली जो ठहरी
गांव की महिलाओं ने उस नई उम्र के बच्चे का भी उपहास उड़ाया
मैं गांव की एक बुढ़िया मां हूं
लोग मेरी मजबूरियों से ऐसे खेलते हैं जैसे मैं कोई गुड़िया मां हूं
धन्य है जिसने मुझको दी कुर्सी वह बच्चा
मर मर कर जी रही हूं
सोचती हूं शायद कभी तो होगा कुछ अच्छा
ऐ दुनिया वालों ! मैं रहूं या न रहूं
पर मेरे बच्चे का ख़्याल रखना
आप चाहे क्षत्रिय हों या ग्वाला
मेरे बेटे की मौत पर डाल देना एक निवाला और मधुशाला का एक प्याला
मैं मां हूं
मैं बूढ़ी हूं
मौत मेरा इन्तजार कर रही है
मेरी गरीबी मेरा उपहास कर रही है
जवान होती तो मैं अपना जिस्म भी
दुनिया वालों तुम्हारे हवाले कर देती
पर अफसोस !मैं बूढ़ी मां हूं
हरिकेश यादव काशी
हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी
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