चांद की धवल चांदनी में
बैठी थी वह अपनी बालकनी में
मानो ऐसा लग रहा था कि दो चांद हों
एक इस धरा पर और दूसरा उस अम्बर में
दोनों में फर्क बस इतना था कि आसमान का चांद कालिमा लिए हुए था और
मेरा चांद लालिमा लिए हुए था
हरिकेश यादव
काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी
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