पढ़ने को आतुर था आंसू तेरे, रोते में चुम्बन लेकर
लिपट-लिपट कर रोते थे , खुला गगन देख देख कर
दुःख क्या था तुझको, सुख दे कर मुझको ?
करूणा की इन बूंदों में,तुम पुकार रही थी किसको?
क्यों तुझको हार गए , तुझको पाकर ?
'हार'का आंसू अब छिपाएं , कहां जाकर?
न तुम हुए हमारे , न हम हुए हमारे आखिर हानि तुम्हारी
क्या है ? जब हम फिरते हैं मारे-मारे
आंसुओं का मेरे अब कोई मोल नहीं
कड़वाहट है जीवन में मेरे ,अब तेरे मीठे-मीठे बोल नहीं
मैं व्यर्थ प्रतीक्षा लेकर ,गिनता दिन सारे
अपलक आंखों से गिरते रहते हैं आंसू, कैसे हैं दुर्भाग्य हमारे?
भीगा-भीगा कर दूंगा आंसुओं से अपने , तुम्हारी राहों को
तड़प-तड़प कर लिखूंगा , तेरे हर गुनाहों को।
हरिकेश यादव, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी
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