हिन्दी दिवस पर हिन्दी पर बोलना,
बेमानी लगता है,
जब अपनी ही कक्षा में हिन्दी का भविष्य
अनजाना लगता है।
मैंने हिन्दी को कितना जिया है?
मैंने हिन्दी को कितना सिखाया है?
मैंने हिन्दी के कितने दीप जलाए हैं?
विद्यालय में हिन्दी को
कितना समृद्ध किया है ?
कितनी किताबें बच्चों के हाथों में दीं?
कितने शब्द उनके मन में बोए?
कितनी अभिव्यक्ति को स्वर दिया?
कितने मौन बच्चों को
बोलना सिखाया?
इसलिए आज मंच से
हिन्दी की महानता गिनाने के बजाय
सोचता हूँ
जिस दिन मेरे बच्चे
हिन्दी पढ़ेंगे, लिखेंगे, बोलेंगे,
अपने विचारों को निर्भय होकर खोलेंगे—
उस दिन समझूँगा
कि मैंने हिन्दी के लिए
कुछ किया है।
वरना—
हिन्दी दिवस पर हिन्दी पर बोलना,
सचमुच बेमानी लगता है।
जब तक हिन्दी
मेरे भाषण में नहीं,
मेरे विद्यालय के बच्चों की
आवाज़ में नहीं उतरती—
तब तक हर उत्सव
मुझे अधूरा लगता है।
हिन्दी दिवस पर हिन्दी पर बोलना बेमानी लगता है
-हरिशंकर 'हरि'