विज्ञापन

आज निर्भया खड़ी अकेली कातर स्वर में तुम्हें पुकारे

Hari Ram

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज निर्भया खड़ी अकेली,
        
                                                    
                            
कातर स्वर में तुम्हें पुकारे
अब अपराधी आज़मा रहे,
नित नये नवेले दांव।
दलील दे रहे ऐसी ऐसी,
जिनके न सिर न पांव ।
जिनके न सिर न पांव,
सुनकर लोग हो रहे शर्मिंदा।
जो लोग दे रहे प्रश्रय उनको,
वह मानव न हैं वह पशु बृंदा।
मानवाधिकारों की दे दुहाई,
कर रहे काम वह गन्दा ।
उनके गले में डालो जल्दी,
मरने तक फांसी का फंदा ।।

जो उन्हें बचाने की खातिर,
तिकड़म नयी नयी चल रहे।
क्या उन्होंने कभी है सोचा,
अपराधी इससे फल रहे ।
अपराधी इससे फल रहे,
हंस रहे देश के विधान पर।
जगो देश की सोयी जनता,
लो फैसला बेटी के सम्मान पर।
निकल घरों से निर्भया से बोलो,
हम संग खड़े सीना तान कर।
न्याय दिलायेंगे तुमको बेटी,
या जीवन अपना देंगे दान कर।।

क्या यही है वह देश हमारा,
जो अब से सात साल पहले था।
जो कैन्डिल लेकर सड़कों पर निकला,
जंतर-मंतर पर रहा था गाना गा।
जंतर-मंतर पर रहा था गाना गा,
लगा रहा था न्याय न्याय के नारे।
आज निर्भया खड़ी अकेली,
कातर स्वर में तुम्हें पुकारे ।
मेरे देश क्या तुम भूल गये,
मुझसे किए जो वादे सारे ।
कृष्ण कन्हैया मधुसूदन बनकर,
शिशुपाल के कर दो वारे न्यारे ।।

हरी राम यादव, फैजाबादी

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ankit Kumar

10845 कविताएं

View Profile

Dn Chaubey

7356 कविताएं

View Profile