मिलो एक
सिर वाले रावण
से जिसके
नाभि का
अमृत
अब तक सूख
नहीं पाया है
और जो अब
तक जलाया
न जा सका ।
ये हमारे
चारों ओर
आंखों में
अंगारे लिए
घूमते रहते हैं।
और
हम डर कर
भागते रहते हैं
चुनावी मौसम
में सफेद
केंचुल लिए
हाथ जोड़े
सिर झुकाए
गांव गांव
गली गली
बाहें फैलाए
मिलते रहते
हैं ।
एक सिर
वाले रावण
के पास भी
मेघनाद
कुम्भकर्ण
अतिकाय
विरूपाक्ष
आदि मिल
जाते हैं।
तमंचे लहराते
हैं
और कान में
धीरे से कुछ
कह जाते हैं
हिला देते हैं
लोक तंत्र को
तमंचे की
नोक पर
और धड़ल्ले
से संसद
पहुंच जाते हैं
उनकी सोने की
लंका आज तक
नहीं जली
हमारी झोपड़ी
पर ईट पत्थर
बरसाते हैं।
एक सिर वाला
रावण लुटेरा है
कैसे कहूं यह
जनतंत्र मेरा है
चुनाव नहीं लड़
सकता पैसे के
अभाव में
कहां सबेरा है?
-हंस नाथ यादव