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चल रहा हूं मैं निरंतर

Hans Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पानी से
        
                                                    
                            
डूबी सड़क पर
एक भीगी शर्ट
लेकर चल रहा
हूँ मैं निरंतर।
खेत की मेड़ों
से होकर
गाँव में अपनो
को खोकर
साथ लिए जीवन
की ठोकर
चल रहा हूँ
मैं निरंतर।
अलनीनों का
जहर है।
मानसून का
पहर है
धान के पोंधे
थिरकते
भर गए हैं
ताल पोखर
चल रहा हूँ
मैं निरंतर।
फटी साड़ी
त्याग दी है।
नीली साड़ी में
सजी है
आज मेरी प्रिय
पोखर
पास में बगुला
खड़ा है
लम्बी गर्दन में
बड़ा है
चोंच में
मछली दबाए
हौले से ही
उड़ पड़ा है
पीपल वाले
पेड़ पर पंख
को खुजला
रहा है
आज मछली
को निगल कर
चल रहा हूँ
मैं निरंतर
चल रहा हूँ
मैं निरंतर।।
 
एक महीने पहले
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