पानी से
डूबी सड़क पर
एक भीगी शर्ट
लेकर चल रहा
हूँ मैं निरंतर।
खेत की मेड़ों
से होकर
गाँव में अपनो
को खोकर
साथ लिए जीवन
की ठोकर
चल रहा हूँ
मैं निरंतर।
अलनीनों का
जहर है।
मानसून का
पहर है
धान के पोंधे
थिरकते
भर गए हैं
ताल पोखर
चल रहा हूँ
मैं निरंतर।
फटी साड़ी
त्याग दी है।
नीली साड़ी में
सजी है
आज मेरी प्रिय
पोखर
पास में बगुला
खड़ा है
लम्बी गर्दन में
बड़ा है
चोंच में
मछली दबाए
हौले से ही
उड़ पड़ा है
पीपल वाले
पेड़ पर पंख
को खुजला
रहा है
आज मछली
को निगल कर
चल रहा हूँ
मैं निरंतर
चल रहा हूँ
मैं निरंतर।।
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