जिस पुरुष को मे,
मैं कभी देख नहीं सकी
अजीब बात है - वह मेरी उंगलियों की पुरानी स्मृतियां बन गयी ।
उसके पास मैं बैठ भी नहीं सकी
मगर फिर भी हर शाम उसकी चुप्पी मेरे साथ बैठती है ।
मैं कभी उसकी बालों को नहीं छेरी।न जाने फिर भी क्यों बारिश की पहली खुशबू में मुझे लगता है , कोई अनदेखी बालों की खुश्बू महक उठी
शायद स्पर्श केवल छूने मात्र से नहीं होता
कभी - कभी किसी की आवाज ही जिस्मो में गर्म सांस की तरह उतरती है ।
शायद मैं उसे पा नहीं सकती मगर
वो मेरे भीतर रखी इत्र की उस ख़ुशबू की तरह है ,
जिसे मुझे खोलने की जरूरत भी नहीं
वह हथेलियों पर नहीं , उम्र की धड़कनों में मेहसूस की जाती है
इसलिए शायद वो मेरे पास ना होकर भी मेरे सबसे करीब होता है ।
-चेतना झा